कलम का सिपाही बचपन में बहुत शरारती था जब मां से पड़ी मार, पढ़ें पूरा किस्सा

कलम का सिपाही की कहानी : कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद (Premchand) की जीवनी ‘कलम का सिपाही‘ (Kalam Ka Sipahi) ने हिंदी के जीवनी साहित्य में अपनी खास जगह बनाई है। ‘कलम का सिपाही‘ का ‘राजकमल प्रकाशन’ के ‘हंस प्रकाशन’ (Hans Prakashan) ने फिर से प्रकाशन किया है। इस बार ‘कलम का सिपाही’ की प्रस्तावना प्रेमचंद के पौत्र विद्वान आलोचक-लेखक आलोक राय (Alok Rai) ने लिखी है। ‘कलम का सिपाही’ का पहला संस्करण 1962 में प्रकाशित हुआ था।

‘कलम का सिपाही’ के जीवनीकार प्रेमचंद के पुत्र और ख्यात लेखक-कथाकार अमृतराय हैं। लेकिन उन्होंने यह जीवनी पुत्र होने के नाते नहीं, बल्कि एक लेखक की निष्पक्षता के साथ लिखी है।

प्रेमचंद ने ‘हंस’ नाम की एक पत्रिका शुरू की। जब प्रेमचंद के दूसरे पुत्र अमृत राय ने 1948 में अपना प्रकाशन शुरू किया, तो उन्होंने इसका नाम हंस प्रकाशन रखा। पिछले साल प्रेमचंद की जयंती के दिन 31 जुलाई 2020 को ‘हंस प्रकाशन’ बड़े हिंदी प्रकाशन समूह ‘राजकमल प्रकाशन’ में शामिल हुआ था।

कलम का सिपाही
कलम का सिपाही

‘कलम का सिपाही’ में आपको मुंशी अजैब लाल और आनंदी के बेटे धनपत राय से लेकर बादशाह मुंशी प्रेमचंद तक के सभी किस्से, घटनाएं और बातचीत या नवाब की कहानी पढ़ने को मिलेगी। प्रस्तुत है इस जीवनी से प्रेमचंद के बचपन की शरारतों से भरी रोचक कहानियां-

प्रेमचंद का जन्म (Munshi Premchand Birthday)

सावन बड़ी 10 संवत 1937, शनिवार 31 जुलाई, 1980 लमही के कच्चे पुश्तैनी घर में एक लड़के का जन्म हुआ जिसे बाद में दुनिया प्रेमचंद के नाम से जानती थी। लड़का बहुत गोरा था। सब बहुत खुश थे। उनके पिता ने उनका नाम धनपत और ताऊ का नाम नवाब रखा।

वह नवाब से छह से सात साल बड़ी थी। माँ उससे कम प्यार नहीं करती थी, लेकिन नवाब में मानो उसकी जान चली जाती थी। बालक चंचल था जिसे ‘तोन्हा’ कहा जाता था, वह लगातार चहकता रहता था, राय-नॉन से नजरें हटा लेता था और पांच-छह साल की उम्र तक दिथुना नवाब पर रखा जाता था। मां की बस चलती तो बेटे को अपनी गोद से कभी अलग नहीं होने देती।

साथी का कान काट लिया

इस तरह बचपन के कुछ साल माँ की ममता की कोमल छाँव में बहुत ही मधुर रहे। माँ प्यारी थी और कहो शरारत या मज़ाक, घुटने में लेटी थी। आए दिन कुछ न कुछ होता रहता था और वह घर पहुंच जाता था। एक दिन ऐसा हुआ कि लड़के नाई की भूमिका निभा रहे थे। नवाब को शरारत का एहसास हुआ, उसने ललन के एक लड़के रामू को शेव करते हुए बांस की छड़ी से उसका कान काट दिया। कान काट दिया जाए तो अच्छा नहीं, लेकिन खून धीरे-धीरे बहने लगा। रोते-बिलखते रामू अपनी मां के पास पहुंचा। जब मां ने अपने बेटे के कान से खून बहता देखा तो वह भड़क गई और रामू को एक हाथ से पकड़कर उसे डांटने के लिए नवाब की मां के पास गई।

नवाब ने जैसे ही उसकी आवाज सुनी, वह खिड़की के पास छिप गया। मां ने उसे दुबके हुए देखा तो उसे पकड़ लिया और थप्पड़ की चार रसीदें बना लीं। तुमने रामू का कान क्यों काटा?

नवाब ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया- पता नहीं वो कैसे कट गया, मैं शेव कर रहा था!

नवाब का निशाना मशहूर

कटनी के दिनों में किसी के खेत में घुसना, पेड़ तोड़ना, मटर उखाड़ना – यह तो रोज की बात थी। इसके लिए किसानों को गाली-गलौज करनी पड़ी, लेकिन लगता है उन गालियों ने उन्हें मटमैला और मीठा, मटर-नरम बना दिया! चूंकि लम्ही हमेशा से एक बहुत ही गरीब गांव रहा है, इसलिए किसी ने इस बात की परवाह भी नहीं की और अक्सर इसका मजाक उड़ाया जाता था। घर में डांट-फटकार होती थी, लेकिन एक-दो दिन बाद फिर से उसी तरह।

नवाब भी ढेला चलाने में बहुत होशियार था, तिकोर पेड़ पर आ जाता था और उसकी चांदनी शुरू हो जाती थी। लक्ष्य को इस तरह से मारना कि दो या तीन डंप में आम जमीन दिखाई दे। पेड़ का रखवाला चिल्लाता रहा और आम की फलियाँ इकट्ठा करके नवाब की मंडली तबाह हो जाएगी। और सबसे ज्यादा मजा शूटिंग में आता है जब आम पकने लगते हैं। तेज निगाहों ने सभी आम के पेड़ों को देखा और जहां किसी भी शाखा में कोई अंकुर नहीं दिख रहा था, पकौड़ी शुरू हो गई। यह अफ़सोस की बात है कि यह दो-तीन चक्रों में नीचे नहीं आता है। रखवाला चिल्लाता है तो चिल्लाते हैं गाली देते हैं, दे देते हैं, आम से हमारा मतलब उसकी गाली से है! जब तक वह अपनी छड़ी लेकर आएगा, हम कहीं होंगे! नवाब का निशाना अपने घेरे में प्रसिद्ध था, इस मामले में वह अपने समूह के सभी लड़कों का शासक था।

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लोग आज भी उनका महिमामंडन करते हैं-जैसे उनका गुल्ली-डंडा। सुनने में आता है कि उनका टोल अच्छी तरह से तय हो गया था, तब गुल्ली 150 गज की खबर लिया करते थे। लेकिन वह थोड़ी देर बाद की बात है, मेरे हाथ में अब उतनी ताकत नहीं थी।

जिस घर के सामने मुंशी जी का अब अपना घर है, वहाँ एक बहुत पुराना, बहुत बड़ा इमली का पेड़ था। उसके नीचे न केवल लाला (महाबीर लाल) का बिस्तर था, खेलने के लिए भी काफी जगह थी, साफ-सुथरी। वहां इमली और महुआ के सिक्कों का खेल होता और कबड्डी की शिफ्ट जम जाती।
इसी तरह बचपन के सुहाने दिन गुजर रहे थे, कभी पल में तो कभी पिता के साथ कहीं और।

उस समय नवाब की उम्र करीब छह साल थी। आठवें वर्ष में उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की थी, वही अध्ययन जो कायस्थ परिवारों में प्रचलित था, उर्दू-फ़ारसी। लम्ही से डेढ़ मील की दूरी पर एक गांव लालपुर है। एक मौलवी साहब रहते थे जो पेशे से एक दर्जी थे लेकिन एक मदरसा भी लगाते थे।

थोड़ा अध्ययन था, बहुत उछल-कूद। चपलता की कोई कमी नहीं है। कभी बंदर-भालू नृत्य होता है तो कभी आपस में घुड़दौड़। रामू, रघुनाथ पिरथी, पदरथ, बांगुर, गोवर्धन और भी बहुत कुछ, एक पूरी सेना थी। तीन महीने तक आमों की पकौड़ी चलती रही। इतने कच्चे आम खा गए कि पूरी फसल कट जाएगी। अगर आम जाली होता तो पकना भी शुरू हो जाता। किसी का नमक यहीं से आता है, किसी का जीरा, किसी का हींग, किसी का नया हाथ। फिर कोई हाथ लेने जाता, बाकी लोग बांस के पत्ते इकट्ठा करने लगते। पास ही बांसवारी थी। फिर आग जलाई जाती, आम भुन जाते। पन्ना बनाने का एक पूरा शास्त्र था और इस शास्त्र के केवल दो शिक्षक थे। उनमें कोई नवाब नहीं था। लेकिन हां, वह भाग लेने में सबसे आगे थे। यह गर्मियों का नक्शा था।

सर्दियों के दौरान, उसने कई राख तोड़ दी। उसी में यह भी शर्त है कि ओख का सबसे बड़ा चीप किसे मिल सकता है! कभी-कभी वह कोल्हाड़ा जाता जहाँ गुड़ बनाया जा रहा था, वहाँ उसे पनु रस (जो फिर से पानी में खोई भिगोकर तैयार किया जाता है) या कच्चा गुड़ लेकर बीमार हो गया और उसे अपने दाँतों से लड़ने का मज़ा देखा।

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